दूसरों की राय क्यों हमारी पहचान बन जाती है और इससे कैसे मुक्त हों
क्या आपने कभी कोई काम सिर्फ इसलिए छोड़ा क्योंकि किसी ने कहा यह तुम्हारे लिए नहीं है? या कोई सपना सिर्फ इसलिए दफन किया क्योंकि समाज ने उसे व्यर्थ बताया? हम जाने-अनजाने दूसरों की आँखों से खुद को देखने लगते हैं। जब यही दृष्टि हमारी पहचान बन जाती है तब हम वह नहीं जी पाते जो हम वास्तव में हैं। इस बात में हम खोजेंगे वह मार्ग जो हमें दूसरों की राय की कैद से आज़ाद करे।
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